Wednesday, 4 May 2016

मोहब्बत का फ़साना

कई बार ऐसा हुआ है कि एक अंतहीन पीड़ा ज़ेहन में घर कर जाती है। कारण सिर्फ इतना होता है कि जो चीज़ जिस वक्त मिलनी चाहिये तब नहीं मिलती, फिर मिल भी जाये तो उसकी कीमत मिटटी से भी कम हो जाती है। प्यास के वक्त तो पानी भी अमृत लगता है और बिना प्यास अमृत का भी कोई मोल नहीं।
जब भावनात्मक सम्बल, सहयोग और साथ की जरुरत हो और मिल जाये तो इंसान हर परिस्थिति से उबर सकता है मगर कोई तब साथ देने आये जब व्यक्ति भावनात्मक रूप से शून्य हो चुका हो तब उस साथ का होना महत्वहीन है। अकेलापन एक हद तक तकलीफ देता है उसके बाद वो आदत बन जाता है, फिर किसी का साथ निभाना भी मुश्किल हो जाता है, अकेला इंसान साथ छूट जाने के एक अनजाने डर से रिश्ते बनाने से भी डरने लगता है।
मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं ये सब बातें अभी क्यों कर रहा हूँ मगर इतना तय है कि कुछ बातें बहुत तकलीफ देती है, जानता हूँ कि वक्त सब कुछ ठीक कर देगा मगर जब जख्म दर्द देना बंद कर दें तो मरहम का क्या काम। जब रौशनी की कोई किरण दिखती है तो इंसान चलना शुरू कर सकता है मगर जब आगे सिर्फ नाउम्मीदी का अँधेरा हो तो कदम आगे बढ़ने का साहस नहीं जुटा पाते।
अब तो बस यही ज़िद है कि मंजिल को आना है तो खुद चल कर आये मेरे पास, मैं न तो कदम बढ़ाऊंगा और न ही कोई कोशिश करूँगा। अब परीक्षा मेरी किस्मत की है, मेरे ईश्वर की है और मेरे जज़्बातों की असलियत की है। मेरी भावनाएं अगर सच्ची होंगी, मेरे ज़ज़्बात अगर मासूम होंगे, तो अहसास पंहुचेंगे उस जगह तक जहाँ से जवाब आये।
अब ज़िद ये दिलों में कि देखेंगे
अंजाम ऐ मोहब्बत क्या होगा

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