Tuesday, 3 May 2016

अंतर्मन का संघर्ष

जिन तन्हाइयों ने हमेशा साथ दिया, जिन यादों ने जीने को सहारा दिया, उन्हें ही मिटाना होगा ताकि जगह मिल सके एक नए पौधे को पनपने को। हालाँकि बहुत मुश्किल होता है बंजर जमीन की छाती में हल घोंप कर उसे उपजाऊ बनाना ताकि पौधे को दुनिया देखने का अवसर मिल सके मगर जब वो बीज ही विरोधी हो जाये, उगने से मना करने लगे तो बहुत तकलीफ होती हैं जिसे शब्दों में बयां करना मुमकिन नहीं। लगता है जैसे सारी मेहनत पर पाला पड़ गया हो। सब्र और उम्मीद तभी तक रखी जा सकती है जब तक कोई इच्छाशक्ति दिखाई दे वरना तो बस ढोया जा सकता है रिश्तों की लाश को उम्र भर।
काश कि कोशिशों पर एक नजर डाली गई होती, काश कि गम बांटने की शुरुआत की गई होती। वैसे तो गम भी उसी से बांटे जाते हैं जिसे दिल से अपना माना जाये। खुशियां तो औपचारिक रिश्तों में भी बंटती ही हैं।
खैर वक्त से बड़ा बलवान कोई नहीं। अच्छे अच्छे रिश्तों को ठीक करने और गलतफहमियों को ठीक करने में वक्त का कोई सानी नहीं। जहाँ सारी कोशिशें हार जाती हैं वहां वक्त ही एकमात्र सहारा बचता है। आखिरी फैसला वही करता है। देखते हैं क्या होता है, वक्त कहाँ ले जाता है, दिलों को दूर करता है या गलतफहमियों को।

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