Wednesday, 22 May 2013

तन्हाई

पहले तुम थी अब ये तन्हाई है
मगर तन्हाई भी तो तुम्हे ही लाई है
बन गई है मेरी
साँसों की तरह
कुछ रहे न रहे ये रहेगी
आखिरी दम तक
बेशक ज़माने ने छीन लिया है तुम्हे मुझसे
मगर ना छीन सकेगा
इस तन्हाई को
और उसमे बसी हुई तुमको
... पहले भी तुम थी,
अभी भी तुम हो
फर्क सिर्फ इतना है कि अब
सिर्फ तुम सुनती हो
कहती कुछ नहीं
कुछ पूछता हूँ तुमसे
तो याद दिला देती हो कोई गुजरी बात
और मुझे मिल जाता है
मेरे हर सवाल का जवाब

इंतज़ार

मैं कब से वो नज़र तलाश करता हूँ
ना जाने कब से तेरा इंतज़ार करता हूँ।

दिल में आये तो दरिया हो जाए
कब से वो बाकियों को दरकिनार करता हूँ।

तेरा चेहरा चाहे जुदा हो सबसे जहां में
मगर हर शख्स में तेरा ही दीदार करता हूँ।

जो मिल जाओ तुम तो मुकम्मल हो जहां
बस तुम्हारा ही यहाँ ऐतबार करता हूँ।

खून हर किसी का अब उबाल में है

कौन नहीं जानता कि वो किस हाल में हैं
गीदड़ छुपे हुए शेर की खाल में हैं

बहुत उड़ रहे थे परिंदे बन के ख़्वाबों में
नींद से जागे तो जाना पड़े नाल में हैं

चाहे लाख झुठलाने की कोशिश करे मगर
नियत उनकी भी बेईमानी के माल में है

जितना चाहे मुस्कुरा लो पैसों की भीड़ पर
... पर इस बार जनता भी तुम्हारी ही चाल में है

तूने तो कोई कसर ना रखी थी मगर
उपरवाले का रहम कब से मेरी ढाल में है

ये तो भला है कि जिन्दा हो तुम अब तक
वरना हम तो कब से मौके के ख्याल में हैं

ये समझ ले कि वक्त पूरा हो चुका है तेरा
कि खून हर किसी का अब उबाल में है