बाहर शोर शराबा, भीतर एक सन्नाटा
जैसे
दर्शक बन कर सफ़र ये मैंने काटा
सब
कुछ जैसे आतुर, दिल में
बस जाने को
कोशिश कर रहे हैं मुझमे मिल जाने को
अजनबी सारे चेहरे, नकाब रखे हैं पहने
चेहरों से ज्यादा सबके चमक रहे हैं गहने
नकली
मुस्कान लगाए हर बात पे आँख मिलाये
सच्चाई जान कर भी, दिल कैसे
यकीं लुटाये
व्यस्त अपनी अपनी पीड़ा सब कहने में
वीर
बड़े हैं लगते, तकलीफें
सब सहने में
हालत
साझा कर के साझा ढानढस बंधाते
परिवार से भी ज्यादा खुद अपना स्नेह लुटाते
कैसे
कह रहे हैं, सब अपनी
निज गाथाएँ
कोशिश
में हैं जैसे, सबकी आँखों
में छा जाएँ
कौन
करेगा याद कल इनमे से
किसी को
फिर
मिल भी ना पाएंगे जिंदगी में कभी तो
कितना सच, कितना झूठ, कोई नहीं बुझेगा
मेरा
मैं तो जानूं, फिर क्यों
पूछूं दूजे का
कुछ
सफ़र ख़त्म करते हैं, कुछ उनकी
जगह हैं लेते
शामिल
होते सबकी आधी बातों के बीच में से
कोई
साफ़ करेगा फर्श, अपने मैले
कपड़ों से
साफ़
करके बोलेगा ना, मांगेगा
बस नज़रों से
कोई
करेगा मेहनत कुछ
चीजें बेचने की
रुक,
बाट देख लेगा, बच्चों के
देखने की
लगता
है जैसे जीवन भी होता है एक सफ़र ही
तय
करना है अकेले, होगा ना
हमसफ़र भी
लम्हें, लोग, साथी, आयेंगे जायेंगे
बस उनकी बातें, किस्से,
निशां रह जायेंगे
गम,
ख़ुशी, वादे , कुछ
खट्टी, मीठी यादें
कुछ
उनमे रह जायेंगे, कुछ मुझमे
रह जायेंगे
कुछ उनमे रह जायेंगे, कुछ मुझमे
रह जायेंगे
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