क्यों तलाशते हो तुम मुझे मेरी हर कविता में
कि जैसे लिखी हो मैंने सब अपने ही अनुभवों से
कभी किसी कविता में बेवफा खुद को पाती हो
और दर्द भरे दिल को मुझसे जोड़ बैठती हो
कभी मेरी यादों को जोडती हो हमारी गुजरी बातों से
उस कविता में हंसने वाले दोनों जैसे हम ही हो
क्यूँ हर कविता में वो लड़की तुम होती हो
और हर वो तन्हा सा लड़का मैं ही
नहीं ऐसा कुछ भी नहीं
ना मैं तन्हा हूँ, ना अकेला और ना ही दुखी
बल्कि मस्त हूँ अपनी ही मस्ती में
वो शख्स कोई और है
उसे किसी और ने धोखा दिया है
ना तुम हो, ना मैं
तुम तो मुझमे हर वक्त हो फिर क्यूँ रहूँ मैं दुखी
बदल डालो हर कविता का मतलब
और देखो उन दोनों तन्हा लोगों को
मेरी तरह सड़क किनारे से
और रहो खुश क्यूंकि मैं हूँ
अब भी तुम में ही
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