अपनी ऐशगाह में बैठ कर तुम यूँ बरगलाते हो
खुद की रौशनी के लिए औरों का दिल जलाते हो
बहुत मुद्दत से तुमने गरीबों की भूख नहीं देखी
तुम तो सदा अक्ल के अंधों को ही चराते हो
कोई कैसे यकीं कर ले अब तुम पर हर दफा
खुद ही कहते हो और खुद ही मुकर जाते हो
शक्ल तुम्हारी कुछ जानी पहचानी सी लगती है
हां तुम ही तो हर पांच साल में लौट कर आते हो
अगर कहते हो खुद को सेवक तो जरा बताओ
अपने घर पर हमेशा ही ये ताले क्यूँ लटकाते हो
सिर्फ जिन्दा लोगों को लूट लेते तो फिर भी ठीक था
तुम तो सुकून भरी लाशों के भी आशियाने चुराते हो
बहुत ढूंढा मगर नहीं मिला तुम्हारा ठिकाना
बस इतना बता दो तुम खाना कहाँ खाते हो
खुद की रौशनी के लिए औरों का दिल जलाते हो
बहुत मुद्दत से तुमने गरीबों की भूख नहीं देखी
तुम तो सदा अक्ल के अंधों को ही चराते हो
कोई कैसे यकीं कर ले अब तुम पर हर दफा
खुद ही कहते हो और खुद ही मुकर जाते हो
शक्ल तुम्हारी कुछ जानी पहचानी सी लगती है
हां तुम ही तो हर पांच साल में लौट कर आते हो
अगर कहते हो खुद को सेवक तो जरा बताओ
अपने घर पर हमेशा ही ये ताले क्यूँ लटकाते हो
सिर्फ जिन्दा लोगों को लूट लेते तो फिर भी ठीक था
तुम तो सुकून भरी लाशों के भी आशियाने चुराते हो
बहुत ढूंढा मगर नहीं मिला तुम्हारा ठिकाना
बस इतना बता दो तुम खाना कहाँ खाते हो

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