अंग्रेजी
बस एक भाषा है पर आज ऐसे लगता है जैसे इसने अपने
भाषा होने का रूप छोड़ कर एक मानसिकता का रूप धर लिया है। क्युं हमें ये भाषा इतनी
अच्छी लगती है कि हम उनसे भी इसी भाषा में बात करने लगे है जो हमारी राष्ट्रभाषा
से अच्छी तरह परिचित है।
इसका मुख्य उद्देश्य बस उन लोगों से बात करना था जो
हमारी भाषा नहीं जानते और पुरे विश्व पटल पर हमारे देश को पहचान दिलाना था, पर क्युं हमारे देश में
ये अनिवार्यता बन गयी है, हमारे ही भाई बहन आपस में अंग्रेजी में बात करते है, मेरे कई भाई तो हर चीज़
में अंग्रेजो को हमसे आगे बताते है और सीधा उनकी हमसे तुलना करने लग जाते है हर
बात में, ऐसा लगता है जैसे मैं उनसे नहीं किसी अंग्रेज से बात
कर रहा हूँ जो अपनी श्रेष्ठता की पैरवी कर रहा हो।
और सबसे मजे की बात तो ये है की अंग्रेजी बोलने को स्टैण्डर्ड का दर्जा
दे दिया जाता है।
अगर हमें विदेश में नौकरी करनी हो या
देश में रह कर विदेशियों के साथ काम करना हो या कहीं ऐसी जगह भारत का प्रतिनिधित्व
करना हो जहाँ लोग हमारी भाषा से परिचित ना हो या ऐसी जगह पर जहाँ हम इस भाषा को
सीख रहें है वहाँ तो
इसका इस्तेमाल समझ आता है, अन्य
स्थानों पर ये मेरी समझ से परे है।
हमारे ही देश में नौकरी पाने की अनिवार्य शर्त बना दिया जाता है इसे, उस
संस्थान के द्वारा जहाँ पर सभी लोग राष्ट्रभाषा से भली भांति वाकिफ है।
क्या हमारे लिए भी घर की मुर्गी दाल बराबर है?
चलिए बात केवल बोलने तक होती तब तो फिर भी ठीक थी पर इसने तो भाषा से आगे बढ़ कर मानसिकता का रूप ले लिया है। भाषा को सीखा जा सकता है वो भी बिना खुद को बदले मगर मानसिकता को जब जीवन में उतार लिया जाता है तब हम उसके गुलाम हो कर रह जाते है और वो भी अपनी मर्ज़ी से जिसकी कोई स्वंत्रता नहीं।
क्या हमें खुद पर गर्व नहीं, क्यों हम उनके बनाये मानदंडो को ही खुद के अस्तित्व का आकलन करने का पैमाना बना लेते हैं?
आज जितने भी अभिनेता, अभिनेत्रियों, नेताओं को देखता हूँ, उनमे से कुछ एक को छोड़ कर सभी पत्रकारों से अंग्रेजी में बात करते है, जबकि वही लोग परदे पर या फिल्मो में बड़ी अच्छी हिंदी बोलते हैं, तो क्या वो बाहर आते ही हिंदी भूल जाते है या उन्हें शर्म आती है हिंदी में बोलते हुए या फिर वो ऐसे लोगों के लिए बोलते है जिन्हें हिंदी नहीं आती। उनका ये तरीका मेरी तो समझ के परे है और मुझे इसका कोई तर्कसंगत कारण नजर नहीं आता, आपको पता हो तो मुझे बताने का कष्ट करें।
क्या वे परदे पर मज़बूरी में हिंदी बोलते हैं??
और एक सबसे बड़ी विडंबना देखता हूँ की सिर्फ अंग्रेजी जानने की वजह से कुछ लोग खुद को अन्यों से श्रेष्ठतर समझने लगते हैं।
हमारी संस्कृति में आंतरिक उत्थान पर जोर दिया गया है वहीँ उनकी सभ्यता बाहरी दिखावे के दम पर चलती है, जहाँ आंतरिक मूल्यों के लिए कोई जगह नहीं।
उम्मीद करता हूँ हम अंग्रेजी को सिर्फ एक भाषा होने तक ही सीमित रख पाएंगे और अपनी संस्कृति, सभ्यता पर गर्व करते हुए इसे अक्षुण बनाए रखने का हर संभव प्रयास करेंगे।
अगर मैं कहीं गलत हूँ या तस्वीर अधूरी रह गई है तो आपके विचार सादर आमंत्रित हैं।
साधुवाद के लिए भी पर्याप्त प्रतीक्षा रहेगी।
जय हिन्द। जय भारत।
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